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Showing posts with the label कविताएँ

‌वक्त कम‬ है, पूरा जोर‬ लगा दो... ‎कुछ को‬ मैं जगाता हुँ, कुछ‬ को तुम जगा दो...

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‌ वक्त कम‬ है, ‎ पूरा जोर‬ लगा दो .. ‎कुछ को‬ मैं जगाता हुँ, ‎कुछ‬ को तुम जगा दो... निस्वार्थ भाव से "देते रहने की ताकत"

माँ की इच्छा..! रौंगटे खड़े कर देने वाली कविता...| Mother's Will | DevBhartiFun

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रौंगटे खड़े कर देने वाली कवि ता...!!! ____________ माँ की इच्छा ___________ महीने बीत जाते हैं, साल गुजर जाता है, वृद्धाश्रम की सीढ़ियों पर, मैं तेरी राह देखती हूँ।

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो, बच्चों को सिखाने बैठा हूँ...!! Sikshak Hun...Kavita

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो, बच्चों  को  सिखाने  बैठा हूँ मैं   डाक   बनाने  बैठा  हूँ ,   मैं   कहाँ   पढ़ाने   बैठा हूँ कक्षा  में  जाने  से  पहले भोजन  तैयार  कराना है ईंधन क...

Poem: उस रोज़ "दिवाली" होती है...Us Roj Diwali Hoti Hai...

अतिशय सुंदर पंक्तियाँ... 💐💐 जब मन में हो मौज बहारों की चमकाएँ चमक सितारों की, जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों तन्हाई  में  भी  मेले  हों, आनंद की आभा होती है उस रोज़ "दिवाली" होती है ...

चाँद को भगवान् राम से यह शिकायत है की दीपावली का त्यौहार अमावस...

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चाँद को भगवान् राम से यह शिकायत है की दीपावली का त्यौहार अमावस की रात में मनाया जाता है और क्योंकि अमावस की रात में चाँद निकलता ही नहीं है इसलिए वह कभी भी दीपावली मना नहीं सकता। यह एक मधुर कविता है कि चाँद किस प्रकार खुद को राम के हर कार्य से जोड़ लेता है और फिर राम से शिकायत करता है और राम भी उस की बात से सहमत हो कर उसे वरदान दे बैठते हैं आइये देखते हैं । ************************ जब चाँद का धीरज छूट गया । वह रघुनन्दन से रूठ गया । बोला रात को आलोकित हम ही ने करा है । स्वयं शिव ने हमें अपने सिर पे धरा है । तुमने भी तो उपयोग किया हमारा है । हमारी ही चांदनी में सिया को निहारा है । सीता के रूप को हम ही ने सँभारा है । चाँद के तुल्य उनका मुखड़ा निखारा है । जिस वक़्त याद में सीता की , तुम चुपके - चुपके रोते थे । उस वक़्त तुम्हारे संग में बस , हम ही जागते होते थे । संजीवनी लाऊंगा , लखन को बचाऊंगा ,. हनुमान ने तुम्हे कर तो दिया आश्वश्त मगर अपनी चांदनी बिखरा कर, मार्ग मैंने ही किया था प्रशस्त । तुमने हनुमान को गले से लगाया । मगर हमारा कहीं नाम भी न आया । ...

चल इस बार, कुछ ऐसी दिवाली मनाते हैं...

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इस दिवाली, चलो दिल से दिल मिलाते हैं। खोये हुऐ दोस्तों को, फिर ढूंढ़ आते हैं। सदियों से, रिश्तों पे पड़ी, धूल की मोटी परतें हटाते हैं... चल इस बार, कुछ ऐसी दिवाली मनाते हैं। मुरझाये चहेरों पर, रौनक ले आते हैं। हर और बस, मुस्कुराहटें फैलाते हैं। दिल-दिमाग की पूरी सफाई कर आते हैं। खुद से चल, इस बेखुदी को मिटाते हैं। चल इस बार, कुछ ऐसी दिवाली मनाते हैं। किसी अनजान शक्स को दोस्त बना आते हैं। पुराने दोस्तों के शिकवे मिटाते हैं। माँ-बाप से मिल, फिर आशीर्वाद पाते हैं। अपनों को, अपने ही लिये, थोड़ा सा मानते हैं। चल इस बार, कुछ ऐसी दिवाली मनाते हैं। वन-वास गयी, मासूमियत को घर ले आते हैं। अहम्, द्वेष, ईर्ष्या के पटाखे जलाते हैं। दिल में अच्छाई के दिए जलाते हैं। सब कुछ भूल के इस बार, दिल वाली दिवाली मानते हैं। .....Happy Diwali....

मिट्टी वाले दीये जलाना...अबकी बार दीवाली में...

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राष्ट्रहित का गला घोंटकर,               छेद न करना थाली में... मिट्टी वाले दीये जलाना...            अबकी बार दीवाली में... देश के धन को देश में रखना,               नहीं बहाना नाली में.. मिट्टी वाले दीये जलाना...           अबकी बार दीवाली में... बने जो अपनी मिट्टी से,             वो दिये बिकें बाज़ारों में... छुपी है वैज्ञानिकता अपने,                सभी तीज़-त्यौहारों में... चायनिज़ झालर से आकर्षित,                  कीट-पतंगे आते हैं... जबकि दीये में जलकर,            बरसाती कीड़े मर जाते है...

दोस्तो दिल थाम कर पढना बहुत ही नायाब पेश कश की है देश के जवानो के नाम...

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दोस्तो दिल थाम कर पढना बहुत ही नायाब पेश कश की है देश के जवानो के नाम... आ जाओ मेरे सिपाही..... दीवाली का वादा था, अब होली पर तो आ जाना, तुम बिन क्या तीज त्योहार,बस बच्चों को है बहलाना । नही लगता है मन कहीं भी, थम गये हैं मेरे रात दिन, रुक गया है जैसे जीना, बस है साँसो का ताना बाना । थरथराते हैं मेरे हाँथ सजन,  जब छूती हूँ भेजे रुपये, खर्चने को मन करता नही, चूल्हा भी नही चाहती बुझाना। सहलाती रहती हूँ वो साड़ी, जो लाये थे पिछले सावन, पहनूंगी जब तुम आओगे, अभी तो ठीक है वही पुराना । कटती नही है मुझसे प्रियतम, ये लंबी लंबी राते , होते जो पास तो सो जाती,  लेकर बाँहों का सिरहाना । देकर मुट्ठी भर चाँदनी, भर गये अमावस आँचल में, बैरागन सी फिरती हूँ,  बस काम ख़तों को है दोहराना । बैठी हूँ राह देखती मैं ,आ जाओ मेरे सिपाही तुम, लहराते आना तिरंगा हाय, न इसमे लिपटकर आ जाना, मातृभूमि की रक्षा मे, दिया है मैने सब सुख अपना, पर कसम तुम्हे भवानी माँ, सिंदूर मेरा हर हाल बचाना।

#पद्य: सिंह की सवार बनकर रंगों की फुहार बनकर... तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ...

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तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आ ओ..... सिंह की सवार बनकर रंगों की फुहार बनकर पुष्पों की बहार बनकर सुहागन का श्रृंगार बनकर तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ...

#कविता: चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में... मैथिलीशरण गुप्त

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चारु चंद्र की चंचल किरणें... चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

#कविता: खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी... सुभद्रा कुमारी चौहान

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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी... सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

#कविता: मेरा नया बचपन.... सुभद्रा कुमारी चौहान

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मेरा नया बचप न... बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी। गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥ चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद। कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

कवी राहत इंदौरी जी की कविता: उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो ...

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उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो खर्च करने से पहले कमाया करो ...

डॉ. कुमार विश्वास की कविता: मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है तब तक मुझको जीना होगा...

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मै कवि हूँ ... सम्बन्धों को अनुबन्धों को परिभाषाएँ देनी होंगी होठों के संग नयनों को कुछ भाषाएँ देनी होंगी हर विवश आँख के आँसू को यूँ ही हँस हँस पीना होगा मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है तब तक मुझको जीना होगा

डॉ. कुमार विश्वास की कविता: कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है...

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कोई दीवाना कहता है .... कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ! मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !! मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है ! ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!

#कविता- तुम चले जाओगे और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे...

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विदा... तुम चले जाओगे पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे जैसे रह जाती है...

#प्रेरक कविता- कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...हरिवंशराय बच्चन..!!

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लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...।। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है..

#प्रेरक कविता- नर हो, न निराश करो मन को :: मैथिलिशरण उपाध्याय

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नर हो, न निराश करो मन को... कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो...

ओम् नमः शिवाय!! तांडव है और ध्यान भी वो है,अज्ञानी का ज्ञान भी वो है!!

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ना आदि,ना अंत उसका वो सबका,ना इनका - उनका ! वही शुन्य है,वही इकाय जिस के भीतर बसा शिवाय !

कविता: जीवन को सरल रखिये- गुलजार की कविता...

गुलजार की कविता...। कुछ हँस के     बोल दिया करो, कुछ हँस के     टाल दिया करो, यूँ तो बहुत     परेशानियां है तुमको भी     मुझको भी, मगर कुछ फैंसले     वक्त पे डाल दिया करो, न जाने कल क...