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शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो, बच्चों को सिखाने बैठा हूँ...!! Sikshak Hun...Kavita

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो, बच्चों  को  सिखाने  बैठा हूँ मैं   डाक   बनाने  बैठा  हूँ ,   मैं   कहाँ   पढ़ाने   बैठा हूँ कक्षा  में  जाने  से  पहले भोजन  तैयार  कराना है ईंधन क...

चाँद को भगवान् राम से यह शिकायत है की दीपावली का त्यौहार अमावस...

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चाँद को भगवान् राम से यह शिकायत है की दीपावली का त्यौहार अमावस की रात में मनाया जाता है और क्योंकि अमावस की रात में चाँद निकलता ही नहीं है इसलिए वह कभी भी दीपावली मना नहीं सकता। यह एक मधुर कविता है कि चाँद किस प्रकार खुद को राम के हर कार्य से जोड़ लेता है और फिर राम से शिकायत करता है और राम भी उस की बात से सहमत हो कर उसे वरदान दे बैठते हैं आइये देखते हैं । ************************ जब चाँद का धीरज छूट गया । वह रघुनन्दन से रूठ गया । बोला रात को आलोकित हम ही ने करा है । स्वयं शिव ने हमें अपने सिर पे धरा है । तुमने भी तो उपयोग किया हमारा है । हमारी ही चांदनी में सिया को निहारा है । सीता के रूप को हम ही ने सँभारा है । चाँद के तुल्य उनका मुखड़ा निखारा है । जिस वक़्त याद में सीता की , तुम चुपके - चुपके रोते थे । उस वक़्त तुम्हारे संग में बस , हम ही जागते होते थे । संजीवनी लाऊंगा , लखन को बचाऊंगा ,. हनुमान ने तुम्हे कर तो दिया आश्वश्त मगर अपनी चांदनी बिखरा कर, मार्ग मैंने ही किया था प्रशस्त । तुमने हनुमान को गले से लगाया । मगर हमारा कहीं नाम भी न आया । ...

बचपन बाली दिवाली... Very Beautiful Lines by Gulzar...

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बचपन बाली दिवाली .... Bachpan Wali Diwali.... हफ्तों पहले से साफ़-सफाई में जुट जाते हैं।  चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते हैं अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस  पाते हैं दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं  .... दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते हैं चवन्नी -अठन्नी  पटाखों के लिए बचाते हैं सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते हैं सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते हैं चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... बिजली की झालर छत से लटकाते हैं कुछ में मास्टर  बल्ब भी  लगाते हैं टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते हैं दो-चार बिजली के झटके भी  खाते हैं चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते है मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते है दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते हैं बार-बार बस गिनते जाते है चलो इस दफ़े दिवाली घर पे मनाते हैं .... धनतेरस के दिन कटोरदान लाते है छत के जंगले से कंडील लटकाते हैं मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते हैं प्रसाद की  थाली ...

#पद्य: सिंह की सवार बनकर रंगों की फुहार बनकर... तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ...

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तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आ ओ..... सिंह की सवार बनकर रंगों की फुहार बनकर पुष्पों की बहार बनकर सुहागन का श्रृंगार बनकर तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ...

#कविता: चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में... मैथिलीशरण गुप्त

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चारु चंद्र की चंचल किरणें... चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

#कविता: खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी... सुभद्रा कुमारी चौहान

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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी... सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

#कविता: मेरा नया बचपन.... सुभद्रा कुमारी चौहान

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मेरा नया बचप न... बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी। गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥ चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद। कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

कवी राहत इंदौरी जी की कविता: उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो ...

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उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो खर्च करने से पहले कमाया करो ...

डॉ. कुमार विश्वास की कविता: मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है तब तक मुझको जीना होगा...

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मै कवि हूँ ... सम्बन्धों को अनुबन्धों को परिभाषाएँ देनी होंगी होठों के संग नयनों को कुछ भाषाएँ देनी होंगी हर विवश आँख के आँसू को यूँ ही हँस हँस पीना होगा मै कवि हूँ जब तक पीड़ा है तब तक मुझको जीना होगा

डॉ. कुमार विश्वास की कविता: कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है...

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कोई दीवाना कहता है .... कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ! मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !! मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है ! ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!

#कविता- तुम चले जाओगे और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे...

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विदा... तुम चले जाओगे पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे जैसे रह जाती है...

#प्रेरक कविता- कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...हरिवंशराय बच्चन..!!

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लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती...।। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है..

#प्रेरक कविता- नर हो, न निराश करो मन को :: मैथिलिशरण उपाध्याय

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नर हो, न निराश करो मन को... कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो...

वह देश है अपना भारत महान... बहुत ही सुन्दर कविता...!!!

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वह देश है अपना भारत  महान... जहां सहज सरल जीवन है अपना जहां सुंदर मधुर रिश्तों में है अपनापन जहां जन्म लेकर भाग्य को भी हो गर्व जहां उल्लास और उन्नति के हो कई पर्व